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कोरोना संक्रमण का ऐसा खौफ कि शव को कंधा देने से कतरा रहे लोग

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पटना । कोरोना का ऐसा खौफ है कि लोग अंतिम यात्रा में भी साथ छोड़ दे रहे हैं। संक्रमण की ऐसी दहशत है कि कंधा देने वाले नहीं मिल रहे हैं। लॉक डाउन के बाद बुद्ध घाट पर आधा दर्जन से अधिक ऐसे मामले आए हैं, जिनमें परिवार के सदस्य तक नहीं शामिल हुए। कई शवों का अंतिम संस्कार तो चंदा लगाकर किया गया। 

पहली बार दिखा घाट पर डर 
पटना में पहली बार ऐसा देखने को मिला है, जब लोग एक दूसरे के सुख-दुख में जाने से डर रहे हैं। केसरी नगर केचंद्रिका प्रसाद बताते हैं कि उनकी उम्र 78 साल है और इतने दिनों में कभी ऐसा नहीं देखा कि मौत की खबर सुनने के बाद भी लोग जाने को तैयार नहीं। उनके पड़ोस में एक मौत हो गई और पड़ोसी तक घर से नहीं निकले। कोरोना का ऐसा डर था कि महिलाएं व्यवस्था कर किसी तरह से बच्चे के सहारे अंतिम संस्कार कराई।

आए दिन दर्द देने वाली कहानियां 
लॉक डाउन में अंतिम संस्कार में हर तरह से मदद करने वाली मां वैष्णो देवी सेवा समित के संस्थापक मुकेश हिसारिया का कहना है कि अब तक 35 शवों से अधिक का अंतिम संस्कार कराया गया है। इस दौरान कई ऐसे मामले आए, जो दुखी कर गए हैं। लॉक डाउन में सोशल डिस्टेंस बनाकर भी अंतिम संस्कार किया जा सकता ह, लेकिन इसके बाद भी लोग कोरोना के खौफ से अंतिम संस्कार के लिए कदम घर से नहीं निकालते हैं। सामान्य मौत में भी लोगों को कोरोना का डर रहता है और घर वाले ही साथ नहीं आते हैं। ऐसे मामलों में संस्था के सदस्यों के प्रयास से विधि विधान से अंतिम संस्कार कराया जाता है और हर तरह से मदद की जाती है। आर्थिक शारीरिक के साथ शव को घर से लाने तक के लिए वाहन की भी व्यवस्था की जाती है।

इलेक्ट्रिक से हो रहा अंतिम संस्कार
लॉक डाउन में लकड़ी की चिता पर अंतिम संस्कार नहीं के बराबर है। अधिकतर इलेक्ट्रिक से ही किए जा रहे हैं। बांस घाट पर एक दिन में चार से पांच शव आते हैं। कर्मचारियों का कहना है कि शव के साथ पहले तो काफी भीड़ आती थी, लेकिन अब तो एक दो लोग ही साधन से लाते हैं और अंतिम संस्कार कर देते हैं। इलेक्ट्रिक शवदाह गृह के कर्मियों का यह भी कहना है कि कई शव ऐसे भी लाए जाते हैं, जिन्हें संस्थाएं सहयोग न करें तो कोई हाथ लगाने वाला नहीं मिलता है। कर्मचारियों का भी कहना है कि पहले ऐसा नहीं था। कोरोना के डर के कारण ऐसा हो गया है, जिससे लोग शव से दूर भाग रहे हैं। 

भाई ने भी नहीं दिया कंधा 
25 मार्च को एक व्यक्ति की मौत हो गई। घर में पांच भाई हैं, लेकिन कोई शव को कंधा देने के लिए तैयार नहीं हुआ। मोहल्ले के लोग भी घाट तक आने को तैयार नहीं हुए। मौत सामान्य थी, लेकिन दहशत ऐसी थी कि हर किसी को कोरोना ही लग रहा था। घंटों इंतजार के बाद घर वाले घाट तक जाने को राजी नहीं हुए तो मृतक के बेटे ने मां वैष्णो देवी सेवा संस्थान के मुकेश हिसारिया को फोन किया। तब उन्होंने सारा इंतजाम कर अंतिम संस्कार कराया।

शव को हाथ तक नहीं लगाया
28 मार्च को भी शहर में ही एक सामान्य परिवार में मौत हुई। मौत भी सामान्य थी लेकिन लोगों में कोरोना का डर था। रात में मौत हुई और दूसरे दिन दोपहर तक लोग हाथ लगाने को तैयार नहीं हुए। जब अंतिम संस्कार कराने वाली संस्था के लोगों को पता लगा तो वह गाड़ी भेज  शव को मंगाए। बांस घाट पर परिजनों को सहयोग कर शव का अंतिम संस्कार कराया गया। संस्था से जुड़े लोगों का कहना है कि घर वालों के सहयोग नहीं करने से 12 घंटे तक शव पड़ा रहा।

अपने हो गये पराये
तीन अप्रैल को बांस घाट के पास ही चार किलोमीटर की दूरी पर एक महिला की मौत हो गई। इसमें भी पीड़ित परिजनों का साथ देने वाला कोई नहीं था। आसपास के लोगों ने कोई सहयोग नहीं किया। रिश्तेदार भी अंतिम संस्कार में नहीं आ पाए। दूर के लोग लॉक डाउन के कारण नहीं आ पाए, पर पटना में रहने वाले तो कोरोना के खौफ से शव के पास तक नहीं गए।

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