Home बड़ी खबर कोरोना ने आप्रवासी श्रमिकों को दिया बेरोजगारी का गम, तिरस्कार भी नहीं मिले कम

कोरोना ने आप्रवासी श्रमिकों को दिया बेरोजगारी का गम, तिरस्कार भी नहीं मिले कम

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पटना। भले ही महाराष्ट्र की समृद्धि में आप्रवासी श्रमिकों का बड़ा योगदान हो, कोरोना संक्रमण के कारण जब लॉकडाउन लागू हुआ तो यहां के श्रमिकों को वहां तिरस्कार का सामना करना पड़ा। घर से बाहर निकलते ही लोग ‘बिहारियों को बीमारी का जड़’ जैसे ताने मारते थे। भिवंडी एवं पनवेल से गुरुवार को रात 10.38 बजे दानापुर पहुंचने वाले आप्रवासी श्रमिकों ने ट्रेन से उतरने के बाद बातचीत में ये दर्द बयां किए।

मिल मालिक ने बंद करा दिया काम, पूछा नहीं हाल

भिवंडी से आई ट्रेन से उतरे मधुबनी निवासी मो. शकूर ने डबडबाई आंखों से बताया कि पिछले 15 सालों से वे कपड़ा मिल में काम कर रहे हैं। कभी इतनी परेशानी नहीं झेली। मिल मालिक ने 22 मार्च से काम बंद करवा दिया। उनका हाल पूछने भी कोई नहीं आता था। कमरे में ही बंद रहते थे। आवश्यकता पडऩे पर खाने-पीने का सामान खरीदने निकलते थे। सामान भी काफी महंगा मिल रहा था।

हमारे मरने तक की फैलाई जाती थी अफवाह

भिवंडी से ही आए मधुबनी के ही मो. शकील, मो. अली, मो. फिरोज ने बताया कि महाराष्ट्र में तेजी से अफवाह उड़ाई जाती थी कि सैकड़ों बिहारी श्रमिक कोरोना से मर गए। तेजी से स्लम क्षेत्रों में संक्रमण फैल रहा है। मुंबई स्टेशन से ट्रेन खुल रही है, जिससे हजारों बिहारी मजदूर घर लौट रहे हैं। इस तरह की अफवाहों से हम श्रमिक स्टेशन पहुंच जाते थे।

वापसी के टिकट के नाम पर वसूल लिए 765 रुपये

मधुबनी निवासी सुशील कुमार झा एवं राकेश कुमार मिश्र ने बताया कि कपड़ा मिल में काम करते थे। प्रति माह 10 से 12 हजार की कमाई होती थी। घर आने के लिए उन्हें रजिस्ट्रेशन कराना पड़ा। महाराष्ट्र प्रशासन द्वारा प्रति व्यक्ति 740 रुपये टिकट के लिए एवं 25 रुपये बस के लिए वसूले गए। मुजफ्फरपुर के राकेश, जहानाबाद के कलावती, दीपक, जयनगर निवासी गणेश प्रसाद ने भी टिकट के नाम पर 765 रुपये लेने की शिकायत की। कुछ प्रवासी श्रमिक अल्लाह के शुक्रगुजार हैं कि ईद पर घर आ गए पर दुख यह कि वे खाली हाथ आए हैं।

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