Home बड़ी खबर मजबूरियां खींच लाईं, जरूरतें फिर ले जाएंगी!

मजबूरियां खींच लाईं, जरूरतें फिर ले जाएंगी!

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भागलपुर । कोई दयालु ट्रक चालक मिल गया तो ठीक, नहीं तो पैदल ही सैकड़ों किलोमीटर चल गांव पहुंचे हजारों लोग क्या फिर शहरों को लौटेंगे? या पुश्तैनी जमीन पर इनका स्थायी ठहराव गांव के अर्थशास्त्र को बदल देगा?

भागलपुर से यह जमीनी सच्चाई हमने जानने का प्रयास किया तो पाया कि लोग आखिर सोच क्या रहे हैं। हजारों कयास, पर सुदूर गांवों की मिट्टी को समङों और लोगों के मन को टटोलें तो दो भाव साफ समझ में आते हैं। लोगों की लगातार घर वापसी एक तात्कालिक जरूरत और स्थायित्व भाव अभी असमंजस में।

बिहार का पूर्वी क्षेत्र हो या कोसी-सीमांचल का सुदूर इलाका, परिस्थितियां कमोवेश एक सी हैं। भागलपुर के सबौर प्रखंड के सुदूर दक्षिणी क्षेत्र के बैजनाथपुर में दिल्ली, पंजाब, सूरत आदि से कुछ लोग लौट आए हैं। यहीं क्वारंटाइन सेंटर में मिले सुनील कुमार ठाकुर तात्कालिक जरूरत और स्थायित्व के बीच की कशमकश को बखूबी समझाते हैं। पहले वाले भाव में फट पड़ते हैं- दिल्ली में पटरी पर हेयर कटिंग की दुकान चलाते थे। अच्छी कमाई हो जाती थी। लॉकडाउन में भोजन पर आफत आ गई। कोई मदद नहीं मिली। अब नहीं जाएंगे।

रोजगार मिले तो ठिकाना बदलें

दिल्ली से ही लौटे पीपी यादव कहते हैं- मजदूरी करते थे। वहां बीमारी तेजी से फैल रही थी। खाना नहीं मिल रहा था। लेकिन कितने दिन? सब कुछ सामान्य हुआ तो फिर जाना ही पड़ेगा। कुछ ऐसा ही दिल्ली की मंडी में काम करने वाले गोपाल ठाकुर के साथ भी है। बैजनाथपुर, इंग्लिश, सिवायडीह जैसे दर्जनों गांव हैं। यहीं के ग्रामीण हरिद्वार प्रसाद यादव, डबलू दास, रंजीत कुमार, बसंत कुमार वगैरह कहते हैं-समस्या तो है। यहां भी रोजगार नहीं है। परिवार में चार लोग बढ़ते हैं तो पैसे भी चाहिए। सरकार रोजगार की व्यवस्था कर दे तो लोग यहीं रहेंगे, अन्यथा जीवन की गाड़ी तो चलती ही रहेगी। फिलहाल टटका-टटकी (ताजा-ताजा) मामला है तो लोग क्या करें। घर ही भागेंगे न..।

परिस्थितियों के साथ जीना सीख रहे हैं गांव के लोग

गांवों का एक पहलू और भी है कि लोग परिस्थितियों के साथ जीना सीख रहे हैं। योगेंद्र मंडल ने गांव में छोटी सी परचून की दुकान के आगे एक गत्ते पर लिख रखा है- एक मीटर की दूरी से सामान लें। लोग कोरोना के खतरे को समझ रहे हैं। मौजूदा हालात में सुरक्षित ठिकाने की ओर लौट रहे हैं और आगे की भी चिंता सता रही है। क्वारंटाइन सेंटर की तैयारी में जुटे नाथनगर की राघोपुर पंचायत के मुखिया मदन मोहन कहते हैं, जो आ रहे हैं उनमें नब्बे फीसद से ज्यादा फिर लौटेंगे। किसानी की स्थिति क्या बहुत अच्छी है। जगह-जमीन बहुत सारे फैक्टर हैं। बाढ़ की त्रसदी आएगी तो उससे भी जूझना है। जिस परिवेश में ढल जाते हैं उससे निकल पाना बहुत मुश्किल होता है।

बाहर की कमाई से घर पर खेत

सन्हौला के ननोखर निवासी राजेश कुमार, कुंदन, मिथुन, गोराडीह के कोतवाली, रामचंद्रपुर, तरछा, दामूचक आदि के सौ से ज्यादा लोग राजकोट में फंसे हैं। फोन पर व्यथा सुनाई कि रजिस्ट्रेशन के बाद भी आने की व्यवस्था नहीं हो पाई है। मिथुन ने कहा, साल-दो साल पर लौटते थे। उसी कमाई से थोड़ा-बहुत खेत खरीदने की सोचते थे। वक्त के हालात ही अभी ऐसे हैं कि घर वापस खिंच रहा है, पर खेत खरीदने के लिए पैसों का जुगाड़ तो वहीं होगा। गांव में रोजी-रोजगार मिल जाए तो काम चल जाएगा। लेकिन यह सब इतना आसान भी नहीं।

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