Home झारखंड भाजपा की गुटबाजी से निष्क्रिय हो रहे कार्यकर्ता, हार से नेताओं ने नहीं लिया सबक

भाजपा की गुटबाजी से निष्क्रिय हो रहे कार्यकर्ता, हार से नेताओं ने नहीं लिया सबक

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पूर्वी सिंहभूम: झारखंड के बहरागोड़ा विधानसभा क्षेत्र में भाजपा का चेहरा यानी नेतृत्वकर्ता कौन है, इसे लेकर कार्यकर्ता पशोपेश में हैं। पार्टी के भीतर व्याप्त गुटबाजी कार्यकर्ताओं की दुविधा को और बढ़ा रही है।

नाम नहीं छापने की शर्त पर एक कार्यकर्ता ने बताया कि गुटबाजी के कारण पार्टी पिछला विधानसभा चुनाव हार गई। चुनाव के बाद ऐसा लगा कि पार्टी नेता इससे सबक लेंगे। नेताओं के बीच व्याप्त दूरी कुछ कम होगी। लेकिन  पिछले कुछ दिनों से जो कुछ पार्टी के भीतर चल रहा है उससे गुटबाजी की खाई और चौड़ी होती जा रही है। नेता खुलेआम एक- दूसरे पर आरोप-प्रत्यारोप लगा रहे हैं। ऐसे में हम कार्यकर्ताओं को किसी कार्यक्रम में जाने से भी अब डर लगता है।

एक के कार्यक्रम में गए तो दूसरा नाराज हो जाता है। कुछ अन्य कार्यकर्ताओं ने भी ऐसे ही विचार जाहिर किए। शायद, विधानसभा क्षेत्र में सर्वमान्य नेता नहीं होने का ही यह परिणाम था कि चाकुलिया में पार्टी द्वारा घोषणा किए जाने के बावजूद मुख्यमंत्री के पुतला दहन का कार्यक्रम आयोजित नहीं किया जा सका।

पिछले विधानसभा चुनाव के पहले पांच साल तक भाजपा के पूर्व प्रदेश अध्यक्ष डॉ दिनेशानंद गोस्वामी अघोषित तौर पर विधानसभा क्षेत्र में पार्टी का चेहरा बने हुए थे। शहर से लेकर गांव तक जनसंपर्क एवं कई तरह के कार्यक्रमों का आयोजन कर उन्होंने अपना एवं पार्टी का जनाधार भी बढ़ाया था। खासकर, गरीब बेटियों की शादी वाला उनका कार्यक्रम काफी लोकप्रिय हुआ था।

वे आगे बढ़कर पार्टी कार्यकर्ताओं को नेतृत्व दे रहे थे। इस क्रम में तत्कालीन झामुमो विधायक कुणाल षाड़ंगी के साथ उनकी प्रतिद्वंद्विता जगजाहिर थी। उस समय गोस्वामी की सक्रियता देख उन्हें भाजपा से टिकट का स्वाभाविक दावेदार माना जा रहा था।

तब विधानसभा क्षेत्र में झारखंड विकास मोर्चा नेता के तौर पर समीर महंती तीसरा कोण बना रहे थे। बहरागोड़ा की राजनीति में पहला ट्विस्ट तब आया जब समीर महंती जेवीएम छोड़कर भाजपा में शामिल हो गए। इससे पार्टी के भीतर टिकट के दो दावेदार सामने आ गए क्योंकि समीर सांसद विद्युत वरण महतो से करीबी माने जाते थे। लेकिन चुनाव से ऐन पहले बहरागोड़ा की राजनीति ने जबरदस्त करवट ली। कुणाल षाड़ंगी झामुमो छोड़ भाजपा में शामिल हो गए।

वही समीर महंती ने मौका देख अपनी पुरानी पार्टी झामुमो का दामन थाम लिया। भाजपा में शामिल हो कुणाल ने पार्टी का टिकट झटक लिया और डॉ गोस्वामी देखते ही रह गए। लेकिन पार्टी के भीतर व्याप्त गुटबाजी एवं कार्यकर्ताओं की नाराजगी का खामियाजा कुणाल को बुरी तरह हार कर भुगतना पड़ा।

करीब तीन महीने पूर्व भाजपा ग्रामीण जिला एवं मंडल कमेटियों का पुनर्गठन किया गया था। पुनर्गठित कमेटी में अपने लोगों को समुचित प्रतिनिधित्व नहीं मिलने को लेकर पार्टी का एक खेमा नाराज हो गया। जिन लोगों को संगठन में महत्वपूर्ण पद मिला उनके खिलाफ पार्टी के ही लोगों ने सोशल मीडिया पर जमकर आरोप-प्रत्यारोप लगाए तथा उन्हें चुनाव में हार के लिए जिम्मेदार ठहरा दिया। जिला कमेटी के सोशल मीडिया प्रभारी आजाद महतो ने तो इस्तीफा ही दे दिया। इन सब से पार्टी के भीतर व्याप्त गुटबाजी खुलकर सतह पर आ गई।

विधानसभा चुनाव में मुंह की खाने के बाद कुणाल षाड़ंगी ने अपनी रणनीति बदल दी। वे अब बहरागोड़ा की बजाए पूरे जमशेदपुर संसदीय क्षेत्र में सक्रिय नजर आ रहे हैं। उन्होंने अपना डेरा डंडा भी जमशेदपुर में जमा लिया है। संसदीय क्षेत्र के सभी छह विधानसभा क्षेत्रों में उनकी गतिविधि काफी कुछ कह रही है। इधर, बहरागोड़ा में कुणाल के पिता एवं भाजपा के पूर्व विधायक डॉ दिनेश षाड़ंगी शारीरिक अस्वस्थता के बावजूद कार्यकर्ताओं को एकजुट कर दिशा देने के प्रयास में लगे हुए हैं।  इसके साथ ही उन्होंने विरोधियों के खिलाफ मोर्चा खोल रखा है।

कार्यकर्ताओं की बैठक में डॉ षाड़ंगी ने खुलकर कुणाल की हार का ठीकरा पार्टी के दो वरीय नेताओं के माथे फोड़ दिया दिया, जिसका वीडियो भी खूब वायरल हुआ। इससे दोनों नेताओं के समर्थक आग बबूला हो गए। इस बयान के बाद सोशल मीडिया पर जमकर आरोप-प्रत्यारोप का दौर चला। डॉ षाडंगी ने कार्यकर्ताओं संग बैठक में अनुज एवं राजनीति की मैदान के पुराने खिलाड़ी द्विजेन षाडंगी को आगे कर बहुत कुछ इशारा कर दिया।

उधर, सांसद विद्युत वरण महतो के पुत्र कुणाल महतो के दौरे से भी बहरागोड़ा की राजनीति में चर्चाओं का बाजार गर्म हो गया है। सांसद के समर्थक कुणाल में भविष्य का नेता देख रहे हैं। ऐसी स्थिति में भाजपा के निष्ठावान कार्यकर्ता असमंजस में हैं कि किसे अपना नेता माने।

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